बढते कदम
इन बढते हुये कदमो को न रोकना कभी
मुश्किलो को देख कर हिम्मत न छोडना कभी
लोग कहेगे बहुत कुछ सून के न बहकना कभी
रास्ते कठीन हो फिर भी मन्जिल से पहले न रुकना कभी
कठीन कुछ भी नही है, कह के असम्भव पीछे न हटना कभी
आसान हो जायेगी मंजिल कदम पहला तो बढाना कभी
आसमाँ आ जायेगा हाथ मे जी से हाथ को ऊपर उठाना कभी
कारवाँ बन ही जायेगा कदम अपना आगे बढाना कभी
मुश्किलो को देख कर हिम्मत न छोडना कभी
लोग कहेगे बहुत कुछ सून के न बहकना कभी
रास्ते कठीन हो फिर भी मन्जिल से पहले न रुकना कभी
कठीन कुछ भी नही है, कह के असम्भव पीछे न हटना कभी
आसान हो जायेगी मंजिल कदम पहला तो बढाना कभी
आसमाँ आ जायेगा हाथ मे जी से हाथ को ऊपर उठाना कभी
कारवाँ बन ही जायेगा कदम अपना आगे बढाना कभी








3 Comments:
At 6:59 PM,
मिर्ची सेठ said…
आपकी कविता इतनी अच्छी लगी कि अपने सजाल पर भी चिपका दी। आशा है आप बुरा नहीं मानेंगे।
At 7:06 PM,
Kalicharan said…
Is kavita main to ekdum thakuron ka josh samaya hua hai. Sahi likhe rahe.
At 9:28 AM,
Suraj Deo Singh said…
नही मिर्ची सेठ, मै बुरा नहीं मानूगा | ये तो मेरी खुशकिश्मती है कि अपने मेरी कविता को अपने सजाल पर चिपका दी है |
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